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पीछे मुड़कर देखें कि आगे की सोचें? भूपेश दिखा रहे अतीत, भविष्य बता रहे रमन

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रायपुर । छत्तीसगढ़ में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के बीच भ्रष्टाचार के मुद्दे पर राजनीति उबाल मार रही है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के बीच सीधी मैदानी जंग होगी कि नहीं, इसका तो पता नहीं, लेकिन इन दोनों के बीच जो नीली चिडिय़ा सियासी आसमान में उड़ रही है, उसका पतंग की तरह लड़ता पेंच एक इशारा जरूर कर रहा है।मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने रायपुर के प्रियदर्शिनी सहकारी बैंक घोटाले के एक आरोपी के नार्को टेस्ट का वीडियो जारी कर लिखा कि पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को भ्रष्टाचार का अंतरराष्ट्रीय पितामह ठहरा दिया। इस वीडियो में इंदिरा प्रियदर्शिनी बैंक घोटाले की कहानी और एक आरोपी के नार्को टेस्ट की वीडियोग्राफी का हिस्सा है। पंद्रह साल पहले यह घोटाला चर्चा में आया था। आरोप है कि बैंक प्रबंधन और संचालक मंडल ने 54 करोड़ रुपयों की हेराफेरी की थी। जारी वीडियो में वह आरोपी नारको टेस्ट में यह कबूल करते हुए नजर आ रहा है कि उसने तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सहित चार मंत्रियों को पैसा दिया है। कांग्रेस ने विपक्ष में रहते हुए इस मुद्दे को जमकर उठाया था। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा भ्रष्टाचार के पितामह ठहरा दिए जाने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जवाबी हमला कर ईडी की जांच रपट का हवाला देते हुए कह दिया कि यह लो भूपेश बघेल 25 रुपये प्रति टन का साक्ष्य। आगे भी कार्रवाई के लिए तैयारी कर लें। गौरतलब है कि जब ईडी का बयान जारी होने के पहले पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कोयला परिवहन में 25 रुपये प्रति टन अवैध उगाही का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को सोनिया गांधी का एटीएम बता दिया था, तब नाराज भूपेश बघेल ने डॉ. रमन को मानहानि का नोटिस थमाने की चेतावनी दे दी थी। जवाब में डॉ. रमन सहित समूची भाजपा ने चुनौती दी थी कि जितने चाहे मामले लगा दें लेकिन भाजपा आइना दिखाने से पीछे नहीं हटेगी। स्वयं डॉ. रमन ने भी कहा था कि जनता देख रही है कि छत्तीसगढ़ महतारी को लूटने वालों के बचाव में हमें धमका रहे हैं। इधर ईडी की छापेमारी चलती रही और उधर भूपेश बघेल और रमन सिंह के बीच सियासी तकरार बढ़ती चली गई। जब ईडी का बयान जारी हो रहा था उसी शाम मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने डेढ़ दशक पुराने प्रियदर्शनी बैंक घोटाले की याद दिला दी। यह मामला जब 15 साल पहले पूरे शबाब पर था, तब भी डॉ. रमन सिंह और भाजपा का कोई राजनीतिक बुरा नहीं हो सका था। इस मामले के सामने आने के बाद हुए विधानसभा चुनाव में रमन सिंह सत्ता सलामत रखने में कामयाब हुए थे। वैसे राजनीति में यह जरूरी नहीं है कि कभी कोई मामला सत्ता से बेदखल कर ही दे। कई बार जनता ऐसे मामलों पर अधिक ध्यान नहीं देती। कई बार ऐसा भी होता है कि विपक्ष जब इस तरह के मुद्दों पर उम्मीद लगाए बैठा रहता है, तब उसकी आंतरिक कमजोरी ही उस पर भारी पड़ जाती है। जैसा कि 2008 और 2013 के चुनाव में कांग्रेस के साथ हुआ था।छत्तीसगढ़ राज्य के प्रथम चुनाव की बात करें तो 2003 में भाजपा इसलिए जीती थी क्योंकि माहौल उसके अनुकूल ठीक वैसे ही बना हुआ था, जैसे 2018 में वातावरण कांग्रेस के अनुकूल बन गया था। अब अगला चुनाव नजदीक आ रहा है तब फिर यही सवाल सामने है कि जिस तरह ईडी के छापों में भ्रष्टाचार की परतें उधड़ रही हैं और भाजपा खास तौर पर डॉ. रमन सिंह उत्साहित हैं कि यह घपले घोटाले की रपट भाजपा की राह आसान कर सकती है तो क्या प्रियदर्शनी बैंक घोटाला याद दिलाने का मकसद यही है कि जब सीधे तौर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह और उनके सहयोगी मंत्रियों के नाम किसी आरोपी के नारको टेस्ट में सामने आए और कुछ न बिगड़ा हो तो फिर यहां तो अफसरों और कारोबारियों के यहां छापे पड़े हैं तथा इनका भूपेश बघेल अथवा उनकी सरकार से कोई लेना देना नहीं है तब भला ऐसे छापों का कांग्रेस पर कोई राजनीतिक असर कैसे हो सकता है? वैसे भी राजनीति में भ्रष्टाचार के आरोप कोई नई बात नहीं हैं और अब तो ऐसा लगता है कि जनता इसे राजनीतिक शिष्टाचार की तरह समझने लगी है। जनता को सिर्फ इससे मतलब होता है कि उसे राहत मिल रही है या नहीं, वह आहत तब होती है जब वह अपना उत्पीडऩ अनुभव करती है तो यह देखा जाना जरूरी है कि भूपेश बघेल के राज में जनता कितनी खुश है और कितनी नाराज, क्योंकि जब जनता नाराज होती है तो रमन सिंह चले जाते हैं और भूपेश बघेल सत्ता में आते हैं। जनता नाराज होगी तो भूपेश बघेल भी चले जाएंगे। सत्ता पर किसी का स्थाई पट्टा नहीं होता। यह किराए का घर है। मालिक तो जनता है। किराएदार जब तक सलीके से रहेगा, मकान मालिक उसे बेदखल नहीं करेगा। अगर किराएदार मकान में गड़बड़ करेगा तो मालिक उसे नहीं बख्शेगा। अब यहां यह देखा जाए कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भाजपा को अतीत दिखा रहे हैं जबकि भाजपा की ओर से डॉ. रमन उन्हें भविष्य बता रहे हैं। यह बात अलग है कि छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह के भविष्य के बारे में ही तरह-तरह की अटकलें सामने आती रहती हैं और इस पर राजनीतिक आमोद प्रमोद भी होता रहता है। लेकिन मौजूदा वक्त में मुख्यमंत्री के मुकाबले पूर्व मुख्यमंत्री जिस तरह मोर्चा संभाले हुए हैं, वह आने वाले कल की तरफ कुछ न कुछ इशारा तो कर रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन के 70 वें जन्मदिन पर जिस तरह का जलवा नजर आया, वह भी एक सियासी संकेत है। राजनीति में गड़े मुर्दे उखाडऩे का कोई अर्थ अब नहीं रह गया है। छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी नए दौर में लिखेंगे, फिर से नई कहानी वाली लाइन पर चलना ही दोनों धुरंधरों के लिए बेहतर होगा।

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